सोमवार, 29 सितंबर 2014

" ऐ री बकरी...!!! "

" ऐ री बकरी
अब तक तो 
ऐसा कभी 
नहीं सनकी, 
तू तो शबरी थी 
क्यूं हो गई 
कबरी है,
गुस्से का ऐ 
क्या तरीका है,
बिना चारा-पानी 
के इस गोरी ने 
दूध दुहने की 
गुस्ताखी की 
या फिर 
खुले में शौच 
का नतीजा है..??? " 

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

'जन्नत' से 'जहन्नुम' …!!! "

" जलप्लावित है
हजारों गांव,
चल रही राहत
चल रहा बचाव,
उफन रही झेलम
तो सडकों में बहने
लगा डल का जल,
श्रीनगर का ये क्या
हाल हो गया …?
कश्मीर क्यूं इतना
बदहाल हो गया....?
मांगनी पड़ रही है
जान की मन्नत,
क्यों जहन्नुम बन
गई जमीं की जन्नत...!!! "

बुधवार, 25 जून 2014

" चर्चा और खर्चा …!!! "

" किसी का धर्म
 तो किसी का 
कर्म चाय है,
कभी सोते से
 जगाती चाय है 
तो कभी भूख
 मिटाती चाय है , 
किसी को जमीं तो
 किसी को आसमां 
दिखाती चाय है, 
चुनाव पूर्व 
चाय पर
 चर्चा थी,
चुनाव बाद
 चाय पर 
बढ़ गया  
खर्चा है …!!! " 

मंगलवार, 24 जून 2014

"भगवान" को लेकर क्यूं लड़ रहा इंसान है...!!!

भगवान को लेकर क्यूं
लड रहा इंसान है, 
क्या हिन्दू  संग दिवाली
और मुसलमां संग ईद
मनाना पाप है...?
धर्म और मजहब के नाम
क्यूं हो रहा बवाल है,
किसी को मंदिर तो
किसी को मस्जिद
पर ऐतराज है,
किसी को गुरुद्वारे तो
किसी को गिरजाघर
पर नाज है,
किसकी मंशा कैसी,
और कौन लड़ा रहा
इंसानों से इंसान है,
कलयुगी जीवन यूं
निकलते जा रहा
समझने में कि
कौन भगवान और
कौन शैतान है,
"भगवान" को लेकर क्यूं
लड़ रहा इंसान है...???

शनिवार, 18 जनवरी 2014

मुस्कान के पीछे का दर्द

" फूल तो तब भी मुस्कुराता है,
जब उसे यकायक कोई नोचता है
मुस्कुराहट के पीछे के दर्द के बारे
नोचने वाला कदापि नहीं  सोचता है। "

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

" बदलेगी तस्वीर "

" रोटी, कपड़ा
बिजली, पानी
आम आदमी से
छल, बेईमानी
भ्रष्ट राजनीति
है जिम्मेदार
अब जा कर होगा
इसका उपचार
रिश्वतखोरोँ की
बंध गई घिग्घी
मुफ्त पानी
सस्ती बिजली
ग्रेटर कैलाश
में रहने वाला
हो सकता है "आम"
झुग्गी वाला भी
तो लगता है "खास"
दशा-दिशा क्या,
निश्चित बदलेगी
भारत की तस्वीर
अरे, अपने "आप"
पर करो अभिमान
अब वक्त आ गया,
देश के दधीचियों
करते जाओ "हड्डी" दान !

शनिवार, 23 नवंबर 2013

" सइयां और भइया...!!! "

न मजाक 
न नसीहत 
है हकीकत 
ज़ुबां खोली, 
न नियम
बताया 
नजरें मिलाई,
न आँखें
दिखाई,
सिर्फ हिला-हिला
कर दुम....,
पा ली मलाईदार 
पोस्टिंग 
अब कैसा डर,
कोतवाल 
बने हैं सइयां
जिसने
पितातुल्य 
बताकर
"माँ" तक 
बनाई 
अपनी पहुँच, 
वो ही 
अब कहने 
लगा है भइया...!!! "